कुछ महका हैं कुछ बहका हैं
तेरा रूप आज किस झरने से छलका हैं?
खफा ना होना की मैंने तुमसे कुछ न कहा
आज ये मन तो बस हल्का हैं।
तुम हमेशा किसी झोंके की तरह आ जाती हो
मैं खयालो में खोया रहता हूँ - और तुम छुं जाती हो,
अच्छा हैं के तुम बस ऐसी ही राहों
इन ख़यालों को भी तो पता चले तुम कैसी हो।
ये समां जो तुम संग लाती हो
क्या कहीं कोई निशानी भी छोड़ जाती हो?
नहीं मुझे यादों मे नहीं जीना
बस कह दो की तुम्हारे आने में - मेरा सबब पाती हो।
Sunday, July 05, 2009
Saturday, July 04, 2009
इश्क
सोचता हूँ की इश्क हुआ हैं
पर फ़िर ये इश्क कैसा?
जो कर बैठा वो प्यार हैं
और जो हो गयी - वो मोहब्बत
इसके आगे क्या कोई मेरा यार हैं?
छु गए हो तुम बेदर्दी से
ना होश ना खुमार हैं,
इस आवारगी के आगे
मेरी सोच को इनकार हैं।
पर जो ये दर्द होता है
क्या ये तेरी पुकार हैं,
या फिर दरकिनार हैं ये सब
और ये दिल बस बेकरार हैं।
झुक गया घुटनों पर
पर ये दीदार बेकार हैं,
तेरी रूह मैं गर मैं बसता हूँ
तो किसको सोचने का इन्तेजार हैं।
पर फ़िर ये इश्क कैसा?
जो कर बैठा वो प्यार हैं
और जो हो गयी - वो मोहब्बत
इसके आगे क्या कोई मेरा यार हैं?
छु गए हो तुम बेदर्दी से
ना होश ना खुमार हैं,
इस आवारगी के आगे
मेरी सोच को इनकार हैं।
पर जो ये दर्द होता है
क्या ये तेरी पुकार हैं,
या फिर दरकिनार हैं ये सब
और ये दिल बस बेकरार हैं।
झुक गया घुटनों पर
पर ये दीदार बेकार हैं,
तेरी रूह मैं गर मैं बसता हूँ
तो किसको सोचने का इन्तेजार हैं।
Friday, July 03, 2009
क्या कोई
बारीश के संग कुछ भीग रहा हैं
कुछ था साथ जो छुट रहा हैं,
बह रहा हैं मिटटी पर वो कतरा
जाने कौनसा रंग उतर रहा हैं।
यूँ तो बादलो की छांव माझी रही हैं
पर कश्ती डूबने का आसार हो रहा हैं,
किनारा तो नहीं माँगा
फिर किस धरती का अहसास हो रहा हैं।
जो कुछ था वो ढ़ह रहा हैं
बिना आवाज किए सरक रहा हैं,
फिर ये खामोशी क्यों बोल उठती हैं
बिजली के संग क्या कोई कुछ कह रहा हैं।
कुछ था साथ जो छुट रहा हैं,
बह रहा हैं मिटटी पर वो कतरा
जाने कौनसा रंग उतर रहा हैं।
यूँ तो बादलो की छांव माझी रही हैं
पर कश्ती डूबने का आसार हो रहा हैं,
किनारा तो नहीं माँगा
फिर किस धरती का अहसास हो रहा हैं।
जो कुछ था वो ढ़ह रहा हैं
बिना आवाज किए सरक रहा हैं,
फिर ये खामोशी क्यों बोल उठती हैं
बिजली के संग क्या कोई कुछ कह रहा हैं।
Thursday, July 02, 2009
पत्थर
तुम जो आज छोड़ जाते हो
और बिखरा हुआ हैं ये आलम,
मैं सोचता हूँ आज
क्यों जीने की दुवा मैंने मांगी थी।
खुदगर्ज हम थे
या आज खुदा रूठा हैं,
इबादत हमारी
हर हाल मैं रुसवानगी ही थी।
पर अब ये भी तो नहीं भुला जाता
की कुबूल की थी तुमने मेरी अदायगी,
शायद हम वो पत्थर हैं
जिस पर पेशानी कोई टिकी थी।
और बिखरा हुआ हैं ये आलम,
मैं सोचता हूँ आज
क्यों जीने की दुवा मैंने मांगी थी।
खुदगर्ज हम थे
या आज खुदा रूठा हैं,
इबादत हमारी
हर हाल मैं रुसवानगी ही थी।
पर अब ये भी तो नहीं भुला जाता
की कुबूल की थी तुमने मेरी अदायगी,
शायद हम वो पत्थर हैं
जिस पर पेशानी कोई टिकी थी।
Wednesday, July 01, 2009
मजार
जब तुमने चुप्पी साधी हैं
और हम बने बेजुबाँ,
क्यों फिर तूफां की जरुरत हो
रौशनी नहीं यहाँ बेइन्तिहां।
अंदाज़ तेरे और मेरे एक हैं
हम नहीं दो जां जानेजा,
पाकर खोने का जो दौर हैं
उसे न दोहरा मेरे हम वफ़ा।
ये प्यार हमारा खुदा हैं
काफिर भी न झुट्लायेगा,
मजार पर चादर जो तुम छोड़ जाते हो
क्या तू फिर कभी नहीं आयेगा?
और हम बने बेजुबाँ,
क्यों फिर तूफां की जरुरत हो
रौशनी नहीं यहाँ बेइन्तिहां।
अंदाज़ तेरे और मेरे एक हैं
हम नहीं दो जां जानेजा,
पाकर खोने का जो दौर हैं
उसे न दोहरा मेरे हम वफ़ा।
ये प्यार हमारा खुदा हैं
काफिर भी न झुट्लायेगा,
मजार पर चादर जो तुम छोड़ जाते हो
क्या तू फिर कभी नहीं आयेगा?