Saturday, October 31, 2009

रात्र

ये रात्र तू ये
तुझी गरज तशी फार नाहीये
पण अंधारात अंधार विस्तारला
तर फार हरकत नाहीये

हो तू म्हणशीलच
की रोजचा हा तुझा दिनक्रम
पण दिवस हिरावून तू येतेस
म्हणून तुला ही आठवण

नाही तुझ्याशी वैर नाही
सुखद निद्रा नी स्वप्न देण तुझी
पण जेव्हा दिवास्वप्न बघत निद्रानाश होतो
रवीची आहुतीही मग तुझ्याच कुशी

राग किंवा तुझा क्षोभही नाही
अस्तित्वाशी कशाला करायची लढाई
साम्राज्य तुझे हरवते पृथ्वीलाही
चंद्राची कोरही विस्फारून अमाव्यस्या पाही

तूच आता खर तर झालीस आई
तुझ्यातच विलीन होईल ही माझी शाई
ये रात्र तू ये
जगणे आणि मरणे यात आता कुठला फरक नाही

Wednesday, October 28, 2009

आवाजे

दिखाई पड़ती हैं सबको
वो बारीश जो भिगों रहीं हैं
खुशी का ही तो आलम हैं
आज कोई नई शुरुवात हो रही हैं
एक नमकीन सी बूँद भी
इस दौरान संग बह गई हैं
चुपचाप किसीको बिना बताये
रुखसत ले गई हैं

झुटलाने के लाख तरीके
हर कोई अपना चुका हैं
शिकन छुपाता हुआ हसता चेहरा
और मसरूफ जिंदगी के आईने
ढंके जा रहें उन परतो को
जो शायद कभी थी ही नहीं
मानो झुर्रिया कह रहीं हो
सच्चाई और कोई हैं ही नहीं

अभी किस बात का हिसाब करे
खाते और बहीं तो बह गए
वो गंगा भी जो कल थी
पापों का सारा भार ले गई
अब गठरी को कहाँ खोजे
जब गांठ ही छुट गई
कोई कहता हैं अब भी राख़ बची हैं
यहाँ तो बस माटी हैं बिखरी हुई

बड़ा दर्द उठता हैं कभी कभी
और रात गुजरती हैं तारों को देख
सब कुछ सुनासा
लेकिन फिर भी भर जाता हैं
कोई कहानी हैं
जो दोहराती हैं अपने आप को
कुछ अनसुनी आवाजे
हमेशा से जो कुछ कहे जा रही हैं

Friday, October 23, 2009

शेवाळे

किती समुद्रसफरी केल्या
तरी निनावीच जगावे लागले
शिळाच होत्या सारया
अधांतरी नव्हे बुडाशीच जाणे आले।

नक्षीदार किती पाट्या
तरी रंग विरून गेले
जे हवे होते सारे
हवेतच शिरून गेले।

महाल अनं झोपड्या
विटा बांबुचे खेळ झाले
जगणारे कुणी होते
आता श्लेषही उरले।

संश्लेष जुने सारे
निसरड्या वाटा सारया
शेवाळे किनारी असतात
कुणास कसे न माहित झाले।




Tuesday, October 20, 2009

बुझासा

आज जरा दिल खामोश हैं
शीशे के बाहर पीले पत्तों को देखता
बस खड़ा हैं चुपचाप
क्या जेहन मैं कुछ छुपाये हैं
किस बात को अन्दर खाए हैं
चेहरे पे नहीं अंदाज जरासा
कुछ सर्द हवा के झोंके
घिरे हुए हैं अपनी मस्ती मैं
अहसास तो रह गया हैं धरासा
उडेला मैंने कुछ परत पे
सूरज तो अब सहमा हैं
किसकी राह तकता हैं जलासा
हांथो की गर्मी भी नहीं बहला रही
जैसे खंजर पकड़े हुए हो
कैसे कहूँ की सब कुछ तो हैं अपनासा
दीवारों मैं तो पत्थर होते हैं
पर अब ये महल
क्यों लगता हैं बुझा - बुझासा
एक कतरा ही छलका देता
की मैं जी जाता
ऐसे चुपचाप भी तो नहीं मरां जाता

Friday, October 16, 2009

उटण्याचे सुगंध

चंद्राचीही ज्योत
कधी मावळते विझते
लख़्ख प्रकाश पौर्णिमेचा
अमावस्या हिरावते;
ग्रहणही त्यात
एक भरण घालते
समुद्र किनारी
एक कल्लोळ माजवीते

चांदणीही नेहमीच अशी
दूर राहते
वेठीस धरून रात्रीला
स्वःताशीच हसते;
ढगांनाही मधेच युक्ति सुचते
काळोख आकाशी पसरुवनी
लपंडाव एकाकीचा
सारी पृथ्वी खेळते

मी बापडा एक
तुझ्या प्रेमात वेडा
देवाला साकळे घालतो
सखे तु येणा - येणा;
मला ओलीस धरून
तु चंद्र चांदणी पाहतेस
पृथ्वी, किनारा, नी हा समुद्र तुझा
नेहमीच का असा बाजूला लोटतेस

भरती नी ओहटी
तर मी रोजच जगतो
कधी आठवण तुझी
तर कधी तुला स्मरतो;
एका रात्री तु येशील
म्हणून मी खडकच झालो
लाटांनाही आता
मी नवा राहिलो

आज दिवा मात्र एक
कुणी चरणी वाहिला
पण तु आलीस कधी
मला थांग-पत्ता लागला;
गंगा माझे जीवन
तु पवित्र करतेस
जग सुखकर झाले की दुःखकर
स्पर्शुनी विचारतेस

उरलो मी आता
कुणी दुजा तुजसाठी
ही रात्र, चंद्र, नी चांदणी
हसतेये बघ आपुल्यासाठी;
मधुर आहेत सारे
प्रेमाचे हे धागे
ग्रहण, अमावस्या, नी ढग
हे ऋतु आकाशाचे

किनाराच जर आता
आपुले घर झाले
पृथ्वी नी आकाशात
मग का अंतर उरले;
पौर्णिमेचा लपंडाव
एक नवीन पर्व
थोड़े तुझे थोड़े माझे
हे आयुष्याचे बंध - उटण्याचे सुगंध - आता सबधं

Tuesday, October 13, 2009

दुश्मन

अभी कुछ चाहा भी तो नहीं तुमसे
और तुम दिल मांगते हो मेरा
भरा बाज़ार हैं यहाँ
कोई किमत भी तो लगाते जरा

जाँ छिड़कने की बात करते हो
पर हासील हमे कुछ भी तो होगा
हाँ कत्ल का जुर्म जरूर ढोयेंगे
क्या कोई खुदा नहीं मेरा

नहीं नहीं हम पत्थर नहीं
पर ये दिल हैं मेरा
तुफां पर में संवार हो भी जाऊँ
पर ये समन्दर हैं तो तेरा

खफां और नाराज़ तुम हो रहें हो
जैसे बेवाफाएं हमने की हो
नहीं मेरे दुश्मन
तेरा नाम अब दुजा होगा

Friday, October 09, 2009

साया

कोई तो साया होगा
जो इनकार करे होने का
हमे साथ ही तो चलना हैं
क्या मतलब हैं रोशनी को टटोलने का

की मंजर या पडाव
बहते झरने पर झुकाव
बयान करते हैं की सफर हैं
कोई पेड़ तो नहीं खड़ा निहारता हुआ

यूँ तो पाया कुछ भी नहीं जाता
की भग्न हैं ये माया
पर जानने का ये जो सिलसिला हैं
एक नया आसमां तो नहीं देता

कौन है अज्ञात? किसको जानता हूँ?
सब कुछ तो प्रतिबिंब हैं
अंधियारे से उजाले की और
खाली दीपक ही तो नहीं ले जाता

Tuesday, October 06, 2009

अक्षर

प्रतिकार करताही येतो
पण नेहमीच बोलवेल अस नाही
कुठे उमजलिये भाषा आम्हाला
शब्दांच आंगण पेलवेलच अस नाही

अमोघ आणि अबोल
मृदु असतात काही जोडाक्षरं
निसटले तर माती होते
पण मातीला कळणार नाही अस नाही

संवादाच्याही पलिकडे
सौंदर्य असते कुणाकडे
कळेल सारयांणा अवचित
एवढ़े सुलभ उकार असतील अस नाही

जपणूक धाग्यांची हळुवार असे सारी
गुंतले की आपलेसे होतात
कुठे बिंदु कुठे खंड वापरावे
सोनेरी होतील अक्षर सारेच अस नाही

Monday, October 05, 2009

बहोत दूर

बहोत दूर - बहोत दूर
जहाँ नहीं कोई झरोखा
की उजाले को छु सकूँ
या ना वो रोशन रात
की चाँद का कतरा पी सकूँ
ऐसे आलम में अब मैं जीता हूँ

बहोत दूर - बहोत दूर
शीशे और तस्वीर के माने
छलकने से इनकार करते हैं
ना निगाहे ना साया
अपने आप को छूंतें हैं
ऐसे बेकदर लम्हों में अब मैं रहता हूँ

बहोत दूर - बहोत दूर
शिकवे और गिले
नीला आसमान नहीं पाते
ना बेरुख वो हवा छूती
की अहसास ही हो जाए होने का
ऐसे दरकिनार गोते मैं लेता हूँ

बहोत दूर - बहोत दूर
सोच के परे
मीलों अब चल चुका
गुफ्तगू भी नहीं आशना
की सिल गया सब कुछ
ऐसे किसी रोशन कब्र में मैं बसता हूँ



Saturday, October 03, 2009

कसम

आज रुसवे की रात ही सहीं
पर जवाब तो जरूर लेंगे
अब मिटना और क्या बाकि रहां
पर बुझते हुए थोडी आग और देंगे
खामोशी को तो हमने हमेशा हैं समझा
थोड़े जजबाती आज बेशक होंगे

लम्हे हमने नहीं गिने कभी
की जिंदगी तो उनमे ही जी हैं
तेरा जिक्र था जहाँ भी
बस वहीँ बसने की फिक्र की हैं
जब तुम अब फेर रहें हो नजर को
भूल जाते हो हमने तेरे इश्क मैं कितनी जदेद्जोहत की हैं

किसी पे अहसान तो नहीं इश्क करना
की चुकता करने की कीमत नहीं हैं
बस दिल का मामला हैं चाहत
जो जुड़ गए तो मौत ही पी हैं
अगर हम प्यासे रहें तो सवाल था
पर तुम्हे हमारी वफाओं पे क्या कोई शिकायत हुई हैं

पर ये जो परदा सर पे लिए घूमते हो अब
किस जानशीन से तुमने रुखसत ली हैं
अगर दीवानगी पे हमारी भरोसा रहां
तो किस मयखाने मैं तुमने शिरकत की हैं
साकी ये तो बताते जा
क्या तुमने कभी मोह्हबत की हैं -
यूँ तो जमाना दीवाना हैं तेरा
पर मेरे बाद किसको सताने की
तुमने आज कसम ली हैं