ये रात्र तू ये
तुझी गरज तशी फार नाहीये
पण अंधारात अंधार विस्तारला
तर फार हरकत नाहीये।
हो तू म्हणशीलच
की रोजचा हा तुझा दिनक्रम
पण दिवस हिरावून तू येतेस
म्हणून तुला ही आठवण।
नाही तुझ्याशी वैर नाही
सुखद निद्रा नी स्वप्न देण तुझी
पण जेव्हा दिवास्वप्न बघत निद्रानाश होतो
रवीची आहुतीही मग तुझ्याच कुशी।
राग किंवा तुझा क्षोभही नाही
अस्तित्वाशी कशाला करायची लढाई
साम्राज्य तुझे हरवते पृथ्वीलाही
चंद्राची कोरही विस्फारून अमाव्यस्या पाही।
तूच आता खर तर झालीस आई
तुझ्यातच विलीन होईल ही माझी शाई
ये रात्र तू ये
जगणे आणि मरणे यात आता कुठला फरक नाही।
Saturday, October 31, 2009
Wednesday, October 28, 2009
आवाजे
दिखाई पड़ती हैं सबको
वो बारीश जो भिगों रहीं हैं
खुशी का ही तो आलम हैं
आज कोई नई शुरुवात हो रही हैं
एक नमकीन सी बूँद भी
इस दौरान संग बह गई हैं
चुपचाप किसीको बिना बताये
रुखसत ले गई हैं।
झुटलाने के लाख तरीके
हर कोई अपना चुका हैं
शिकन छुपाता हुआ हसता चेहरा
और मसरूफ जिंदगी के आईने
ढंके जा रहें उन परतो को
जो शायद कभी थी ही नहीं
मानो झुर्रिया कह रहीं हो
सच्चाई और कोई हैं ही नहीं।
अभी किस बात का हिसाब करे
खाते और बहीं तो बह गए
वो गंगा भी जो कल थी
पापों का सारा भार ले गई
अब गठरी को कहाँ खोजे
जब गांठ ही छुट गई
कोई कहता हैं अब भी राख़ बची हैं
यहाँ तो बस माटी हैं बिखरी हुई।
बड़ा दर्द उठता हैं कभी कभी
और रात गुजरती हैं तारों को देख
सब कुछ सुनासा
लेकिन फिर भी भर जाता हैं
कोई कहानी हैं
जो दोहराती हैं अपने आप को
कुछ अनसुनी आवाजे
हमेशा से जो कुछ कहे जा रही हैं।
वो बारीश जो भिगों रहीं हैं
खुशी का ही तो आलम हैं
आज कोई नई शुरुवात हो रही हैं
एक नमकीन सी बूँद भी
इस दौरान संग बह गई हैं
चुपचाप किसीको बिना बताये
रुखसत ले गई हैं।
झुटलाने के लाख तरीके
हर कोई अपना चुका हैं
शिकन छुपाता हुआ हसता चेहरा
और मसरूफ जिंदगी के आईने
ढंके जा रहें उन परतो को
जो शायद कभी थी ही नहीं
मानो झुर्रिया कह रहीं हो
सच्चाई और कोई हैं ही नहीं।
अभी किस बात का हिसाब करे
खाते और बहीं तो बह गए
वो गंगा भी जो कल थी
पापों का सारा भार ले गई
अब गठरी को कहाँ खोजे
जब गांठ ही छुट गई
कोई कहता हैं अब भी राख़ बची हैं
यहाँ तो बस माटी हैं बिखरी हुई।
बड़ा दर्द उठता हैं कभी कभी
और रात गुजरती हैं तारों को देख
सब कुछ सुनासा
लेकिन फिर भी भर जाता हैं
कोई कहानी हैं
जो दोहराती हैं अपने आप को
कुछ अनसुनी आवाजे
हमेशा से जो कुछ कहे जा रही हैं।
Friday, October 23, 2009
शेवाळे
किती समुद्रसफरी केल्या
तरी निनावीच जगावे लागले
शिळाच होत्या सारया
अधांतरी नव्हे बुडाशीच जाणे आले।
नक्षीदार किती पाट्या
तरी रंग विरून गेले
जे हवे होते सारे
हवेतच शिरून गेले।
महाल अनं झोपड्या
विटा बांबुचे खेळ झाले
जगणारे कुणी होते
आता श्लेषही न उरले।
संश्लेष जुने सारे
निसरड्या वाटा सारया
शेवाळे किनारी असतात
कुणास कसे न माहित झाले।
तरी निनावीच जगावे लागले
शिळाच होत्या सारया
अधांतरी नव्हे बुडाशीच जाणे आले।
नक्षीदार किती पाट्या
तरी रंग विरून गेले
जे हवे होते सारे
हवेतच शिरून गेले।
महाल अनं झोपड्या
विटा बांबुचे खेळ झाले
जगणारे कुणी होते
आता श्लेषही न उरले।
संश्लेष जुने सारे
निसरड्या वाटा सारया
शेवाळे किनारी असतात
कुणास कसे न माहित झाले।
Tuesday, October 20, 2009
बुझासा
आज जरा दिल खामोश हैं
शीशे के बाहर पीले पत्तों को देखता
बस खड़ा हैं चुपचाप।
क्या जेहन मैं कुछ छुपाये हैं
किस बात को अन्दर खाए हैं
चेहरे पे नहीं अंदाज जरासा।
कुछ सर्द हवा के झोंके
घिरे हुए हैं अपनी मस्ती मैं
अहसास तो रह गया हैं धरासा।
उडेला मैंने कुछ परत पे
सूरज तो अब सहमा हैं
किसकी राह तकता हैं जलासा।
हांथो की गर्मी भी नहीं बहला रही
जैसे खंजर पकड़े हुए हो
कैसे कहूँ की सब कुछ तो हैं अपनासा।
दीवारों मैं तो पत्थर होते हैं
पर अब ये महल
क्यों लगता हैं बुझा - बुझासा।
एक कतरा ही छलका देता
की मैं जी जाता
ऐसे चुपचाप भी तो नहीं मरां जाता।
शीशे के बाहर पीले पत्तों को देखता
बस खड़ा हैं चुपचाप।
क्या जेहन मैं कुछ छुपाये हैं
किस बात को अन्दर खाए हैं
चेहरे पे नहीं अंदाज जरासा।
कुछ सर्द हवा के झोंके
घिरे हुए हैं अपनी मस्ती मैं
अहसास तो रह गया हैं धरासा।
उडेला मैंने कुछ परत पे
सूरज तो अब सहमा हैं
किसकी राह तकता हैं जलासा।
हांथो की गर्मी भी नहीं बहला रही
जैसे खंजर पकड़े हुए हो
कैसे कहूँ की सब कुछ तो हैं अपनासा।
दीवारों मैं तो पत्थर होते हैं
पर अब ये महल
क्यों लगता हैं बुझा - बुझासा।
एक कतरा ही छलका देता
की मैं जी जाता
ऐसे चुपचाप भी तो नहीं मरां जाता।
Friday, October 16, 2009
उटण्याचे सुगंध
चंद्राचीही ज्योत
कधी मावळते विझते
लख़्ख प्रकाश पौर्णिमेचा
अमावस्या हिरावते;
ग्रहणही त्यात
एक भरण घालते
समुद्र किनारी
एक कल्लोळ माजवीते।
चांदणीही नेहमीच अशी
दूर राहते
वेठीस धरून रात्रीला
स्वःताशीच हसते;
ढगांनाही मधेच युक्ति सुचते
काळोख आकाशी पसरुवनी
लपंडाव एकाकीचा
सारी पृथ्वी खेळते।
मी बापडा एक
तुझ्या प्रेमात ग वेडा
देवाला साकळे घालतो
सखे तु येणा - येणा;
मला ओलीस धरून
तु चंद्र चांदणी पाहतेस
पृथ्वी, किनारा, नी हा समुद्र तुझा
नेहमीच का असा बाजूला लोटतेस।
भरती नी ओहटी
तर मी रोजच जगतो
कधी आठवण तुझी
तर कधी तुला स्मरतो;
एका रात्री तु येशील
म्हणून मी खडकच झालो
लाटांनाही आता
मी नवा न राहिलो।
आज दिवा मात्र एक
कुणी चरणी वाहिला
पण तु आलीस कधी
मला थांग-पत्ता न लागला;
गंगा माझे जीवन
तु पवित्र करतेस
जग सुखकर झाले की दुःखकर
स्पर्शुनी विचारतेस।
उरलो न मी आता
कुणी दुजा तुजसाठी
ही रात्र, चंद्र, नी चांदणी
हसतेये बघ आपुल्यासाठी;
मधुर आहेत सारे
ग प्रेमाचे हे धागे
ग्रहण, अमावस्या, नी ढग
हे ऋतु आकाशाचे।
किनाराच जर आता
आपुले घर झाले
पृथ्वी नी आकाशात
मग का अंतर उरले;
पौर्णिमेचा लपंडाव
एक नवीन पर्व
थोड़े तुझे थोड़े माझे
हे आयुष्याचे बंध - उटण्याचे सुगंध - आता सबधं।
कधी मावळते विझते
लख़्ख प्रकाश पौर्णिमेचा
अमावस्या हिरावते;
ग्रहणही त्यात
एक भरण घालते
समुद्र किनारी
एक कल्लोळ माजवीते।
चांदणीही नेहमीच अशी
दूर राहते
वेठीस धरून रात्रीला
स्वःताशीच हसते;
ढगांनाही मधेच युक्ति सुचते
काळोख आकाशी पसरुवनी
लपंडाव एकाकीचा
सारी पृथ्वी खेळते।
मी बापडा एक
तुझ्या प्रेमात ग वेडा
देवाला साकळे घालतो
सखे तु येणा - येणा;
मला ओलीस धरून
तु चंद्र चांदणी पाहतेस
पृथ्वी, किनारा, नी हा समुद्र तुझा
नेहमीच का असा बाजूला लोटतेस।
भरती नी ओहटी
तर मी रोजच जगतो
कधी आठवण तुझी
तर कधी तुला स्मरतो;
एका रात्री तु येशील
म्हणून मी खडकच झालो
लाटांनाही आता
मी नवा न राहिलो।
आज दिवा मात्र एक
कुणी चरणी वाहिला
पण तु आलीस कधी
मला थांग-पत्ता न लागला;
गंगा माझे जीवन
तु पवित्र करतेस
जग सुखकर झाले की दुःखकर
स्पर्शुनी विचारतेस।
उरलो न मी आता
कुणी दुजा तुजसाठी
ही रात्र, चंद्र, नी चांदणी
हसतेये बघ आपुल्यासाठी;
मधुर आहेत सारे
ग प्रेमाचे हे धागे
ग्रहण, अमावस्या, नी ढग
हे ऋतु आकाशाचे।
किनाराच जर आता
आपुले घर झाले
पृथ्वी नी आकाशात
मग का अंतर उरले;
पौर्णिमेचा लपंडाव
एक नवीन पर्व
थोड़े तुझे थोड़े माझे
हे आयुष्याचे बंध - उटण्याचे सुगंध - आता सबधं।
Tuesday, October 13, 2009
दुश्मन
अभी कुछ चाहा भी तो नहीं तुमसे
और तुम दिल मांगते हो मेरा
भरा बाज़ार हैं यहाँ
कोई किमत भी तो लगाते जरा।
जाँ छिड़कने की बात करते हो
पर हासील हमे कुछ भी तो न होगा
हाँ कत्ल का जुर्म जरूर ढोयेंगे
क्या कोई खुदा नहीं मेरा।
नहीं नहीं हम पत्थर नहीं
पर ये दिल हैं मेरा
तुफां पर में संवार हो भी जाऊँ
पर ये समन्दर हैं तो तेरा।
खफां और नाराज़ तुम हो रहें हो
जैसे बेवाफाएं हमने की हो
नहीं ओ मेरे दुश्मन
तेरा नाम अब दुजा न होगा।
और तुम दिल मांगते हो मेरा
भरा बाज़ार हैं यहाँ
कोई किमत भी तो लगाते जरा।
जाँ छिड़कने की बात करते हो
पर हासील हमे कुछ भी तो न होगा
हाँ कत्ल का जुर्म जरूर ढोयेंगे
क्या कोई खुदा नहीं मेरा।
नहीं नहीं हम पत्थर नहीं
पर ये दिल हैं मेरा
तुफां पर में संवार हो भी जाऊँ
पर ये समन्दर हैं तो तेरा।
खफां और नाराज़ तुम हो रहें हो
जैसे बेवाफाएं हमने की हो
नहीं ओ मेरे दुश्मन
तेरा नाम अब दुजा न होगा।
Friday, October 09, 2009
साया
कोई तो साया होगा
जो इनकार करे होने का
हमे साथ ही तो चलना हैं
क्या मतलब हैं रोशनी को टटोलने का।
की मंजर या पडाव
बहते झरने पर झुकाव
बयान करते हैं की सफर हैं
कोई पेड़ तो नहीं खड़ा निहारता हुआ।
यूँ तो पाया कुछ भी नहीं जाता
की भग्न हैं ये माया
पर जानने का ये जो सिलसिला हैं
एक नया आसमां तो नहीं देता।
कौन है अज्ञात? किसको जानता हूँ?
सब कुछ तो प्रतिबिंब हैं
अंधियारे से उजाले की और
खाली दीपक ही तो नहीं ले जाता।
जो इनकार करे होने का
हमे साथ ही तो चलना हैं
क्या मतलब हैं रोशनी को टटोलने का।
की मंजर या पडाव
बहते झरने पर झुकाव
बयान करते हैं की सफर हैं
कोई पेड़ तो नहीं खड़ा निहारता हुआ।
यूँ तो पाया कुछ भी नहीं जाता
की भग्न हैं ये माया
पर जानने का ये जो सिलसिला हैं
एक नया आसमां तो नहीं देता।
कौन है अज्ञात? किसको जानता हूँ?
सब कुछ तो प्रतिबिंब हैं
अंधियारे से उजाले की और
खाली दीपक ही तो नहीं ले जाता।
Tuesday, October 06, 2009
अक्षर
प्रतिकार करताही येतो
पण नेहमीच बोलवेल अस नाही
कुठे उमजलिये भाषा आम्हाला
शब्दांच आंगण पेलवेलच अस नाही।
अमोघ आणि अबोल
मृदु असतात काही जोडाक्षरं
निसटले तर माती होते
पण मातीला कळणार नाही अस नाही।
संवादाच्याही पलिकडे
सौंदर्य असते कुणाकडे
कळेल सारयांणा अवचित
एवढ़े सुलभ उकार असतील अस नाही।
जपणूक धाग्यांची हळुवार असे सारी
गुंतले की आपलेसे होतात
कुठे बिंदु कुठे खंड वापरावे
सोनेरी होतील अक्षर सारेच अस नाही।
पण नेहमीच बोलवेल अस नाही
कुठे उमजलिये भाषा आम्हाला
शब्दांच आंगण पेलवेलच अस नाही।
अमोघ आणि अबोल
मृदु असतात काही जोडाक्षरं
निसटले तर माती होते
पण मातीला कळणार नाही अस नाही।
संवादाच्याही पलिकडे
सौंदर्य असते कुणाकडे
कळेल सारयांणा अवचित
एवढ़े सुलभ उकार असतील अस नाही।
जपणूक धाग्यांची हळुवार असे सारी
गुंतले की आपलेसे होतात
कुठे बिंदु कुठे खंड वापरावे
सोनेरी होतील अक्षर सारेच अस नाही।
Monday, October 05, 2009
बहोत दूर
बहोत दूर - बहोत दूर
जहाँ नहीं कोई झरोखा
की उजाले को छु सकूँ
या ना वो रोशन रात
की चाँद का कतरा पी सकूँ
ऐसे आलम में अब मैं जीता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शीशे और तस्वीर के माने
छलकने से इनकार करते हैं
ना निगाहे ना साया
अपने आप को छूंतें हैं
ऐसे बेकदर लम्हों में अब मैं रहता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शिकवे और गिले
नीला आसमान नहीं पाते
ना बेरुख वो हवा छूती
की अहसास ही हो जाए होने का
ऐसे दरकिनार गोते मैं लेता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
सोच के परे
मीलों अब चल चुका
गुफ्तगू भी नहीं आशना
की सिल गया सब कुछ
ऐसे किसी रोशन कब्र में मैं बसता हूँ।
जहाँ नहीं कोई झरोखा
की उजाले को छु सकूँ
या ना वो रोशन रात
की चाँद का कतरा पी सकूँ
ऐसे आलम में अब मैं जीता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शीशे और तस्वीर के माने
छलकने से इनकार करते हैं
ना निगाहे ना साया
अपने आप को छूंतें हैं
ऐसे बेकदर लम्हों में अब मैं रहता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शिकवे और गिले
नीला आसमान नहीं पाते
ना बेरुख वो हवा छूती
की अहसास ही हो जाए होने का
ऐसे दरकिनार गोते मैं लेता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
सोच के परे
मीलों अब चल चुका
गुफ्तगू भी नहीं आशना
की सिल गया सब कुछ
ऐसे किसी रोशन कब्र में मैं बसता हूँ।
Saturday, October 03, 2009
कसम
आज रुसवे की रात ही सहीं
पर जवाब तो जरूर लेंगे
अब मिटना और क्या बाकि रहां
पर बुझते हुए थोडी आग और देंगे
खामोशी को तो हमने हमेशा हैं समझा
थोड़े जजबाती आज बेशक होंगे।
लम्हे हमने नहीं गिने कभी
की जिंदगी तो उनमे ही जी हैं
तेरा जिक्र था जहाँ भी
बस वहीँ बसने की फिक्र की हैं
जब तुम अब फेर रहें हो नजर को
भूल जाते हो हमने तेरे इश्क मैं कितनी जदेद्जोहत की हैं।
किसी पे अहसान तो नहीं इश्क करना
की चुकता करने की कीमत नहीं हैं
बस दिल का मामला हैं चाहत
जो जुड़ गए तो मौत ही पी हैं
अगर हम प्यासे रहें तो सवाल न था
पर तुम्हे हमारी वफाओं पे क्या कोई शिकायत हुई हैं।
पर ये जो परदा सर पे लिए घूमते हो अब
किस जानशीन से तुमने रुखसत ली हैं
अगर दीवानगी पे हमारी भरोसा न रहां
तो किस मयखाने मैं तुमने शिरकत की हैं
ए साकी ये तो बताते जा
क्या तुमने कभी मोह्हबत की हैं -
यूँ तो जमाना दीवाना हैं तेरा
पर मेरे बाद किसको सताने की
तुमने आज कसम ली हैं।
पर जवाब तो जरूर लेंगे
अब मिटना और क्या बाकि रहां
पर बुझते हुए थोडी आग और देंगे
खामोशी को तो हमने हमेशा हैं समझा
थोड़े जजबाती आज बेशक होंगे।
लम्हे हमने नहीं गिने कभी
की जिंदगी तो उनमे ही जी हैं
तेरा जिक्र था जहाँ भी
बस वहीँ बसने की फिक्र की हैं
जब तुम अब फेर रहें हो नजर को
भूल जाते हो हमने तेरे इश्क मैं कितनी जदेद्जोहत की हैं।
किसी पे अहसान तो नहीं इश्क करना
की चुकता करने की कीमत नहीं हैं
बस दिल का मामला हैं चाहत
जो जुड़ गए तो मौत ही पी हैं
अगर हम प्यासे रहें तो सवाल न था
पर तुम्हे हमारी वफाओं पे क्या कोई शिकायत हुई हैं।
पर ये जो परदा सर पे लिए घूमते हो अब
किस जानशीन से तुमने रुखसत ली हैं
अगर दीवानगी पे हमारी भरोसा न रहां
तो किस मयखाने मैं तुमने शिरकत की हैं
ए साकी ये तो बताते जा
क्या तुमने कभी मोह्हबत की हैं -
यूँ तो जमाना दीवाना हैं तेरा
पर मेरे बाद किसको सताने की
तुमने आज कसम ली हैं।