There is a new website now, which shall be the permanent place for my poetry. I have moved most my posts from blogger and facebook site to it, and all new posts would appear there. I plan to use this blog to post few translated works in late 2010. However, no original work of mine would be hosted here and if you would like please visit:
www.pseudolife.net
Sunday, March 28, 2010
Thursday, December 24, 2009
बाक
स्थित्यंतरे किती पाहिलीत
या इथे स्थिरावर होवूनी
क्रमशः जोपासलेले
काही गीते काही आठवणी।
प्रवासी क्षणभराचे
घटकेला विसावलेले
धाव कुठलीतरी
तरीही थोडेसे जकडलेले।
अस्तित्व माझे
दुर्लक्षित कधी - कधी आपुलेसे
जाणीव पुर्वक कधी कोण
मजसी बोलले।
ऋतुं सारखेच
येणे जाणे लागलेले
वाट कुणाला कुणाची
मी इथेच - कुणासाठी।
माझ्या भाग्यी
चलचित्राचे जीणे
या बाकावर रोजच
कुणी पाहुणे - कुणी मज बिलगलेले।
या इथे स्थिरावर होवूनी
क्रमशः जोपासलेले
काही गीते काही आठवणी।
प्रवासी क्षणभराचे
घटकेला विसावलेले
धाव कुठलीतरी
तरीही थोडेसे जकडलेले।
अस्तित्व माझे
दुर्लक्षित कधी - कधी आपुलेसे
जाणीव पुर्वक कधी कोण
मजसी बोलले।
ऋतुं सारखेच
येणे जाणे लागलेले
वाट कुणाला कुणाची
मी इथेच - कुणासाठी।
माझ्या भाग्यी
चलचित्राचे जीणे
या बाकावर रोजच
कुणी पाहुणे - कुणी मज बिलगलेले।
Wednesday, December 23, 2009
काय हरविले
शोधसी कुणास
या धुक्यात सवालीचाही
नसे आभास
हवेत चाचपड्ती हे हात
कुठल्या वादळाला।
शमेल ते तूफ़ान
असे वाटे जरी आज
ज्याचा आरभंही न पाहिला
त्या दिव्याचा
प्रकाश खुंटेल का।
विझतात वाती सा-या
नी तेलही सरे
विस्तारणा-या आगीत
कुठली राख जळे।
भस्म माथ्यावरचे
पिढ्यान पिढ्या वारसा हाताळे
हस्तक कोण
कुणी सांगावे।
सांगाव्यास कुणी
विसरुनी गेले
शोधा - शोधा अरे
काय हरविले।
या धुक्यात सवालीचाही
नसे आभास
हवेत चाचपड्ती हे हात
कुठल्या वादळाला।
शमेल ते तूफ़ान
असे वाटे जरी आज
ज्याचा आरभंही न पाहिला
त्या दिव्याचा
प्रकाश खुंटेल का।
विझतात वाती सा-या
नी तेलही सरे
विस्तारणा-या आगीत
कुठली राख जळे।
भस्म माथ्यावरचे
पिढ्यान पिढ्या वारसा हाताळे
हस्तक कोण
कुणी सांगावे।
सांगाव्यास कुणी
विसरुनी गेले
शोधा - शोधा अरे
काय हरविले।
Tuesday, December 22, 2009
हवीये
माझ्या गारठलेल्या हातांना
शेकोटीची उब हवीये
मफलर आणि माकड टोपीत
गल्लीच्या टोकाला गंमत हवीये।
पहाटे उठून चोरीच्या लाकडांना
जाळण्याचे सुख हवय
कुत्रे भुंकत असताना
त्यांना धमकवण्याची उसनी हिम्मत हवीये।
धुक्यातून सूर्य किरण टिपतांना
क्षितिज सामावल्याचा भास हवाये
काचेवर दवात नाव कोरतांना
सोन्याची किनार हवीये।
सकाळ जी जीवलगांना
दाटीवाटीच्या शेजारी घुटमळत सोडेल
ती हिवाळी बात
परत अनुभवनयाची संधी हवीये।
शेकोटीची उब हवीये
मफलर आणि माकड टोपीत
गल्लीच्या टोकाला गंमत हवीये।
पहाटे उठून चोरीच्या लाकडांना
जाळण्याचे सुख हवय
कुत्रे भुंकत असताना
त्यांना धमकवण्याची उसनी हिम्मत हवीये।
धुक्यातून सूर्य किरण टिपतांना
क्षितिज सामावल्याचा भास हवाये
काचेवर दवात नाव कोरतांना
सोन्याची किनार हवीये।
सकाळ जी जीवलगांना
दाटीवाटीच्या शेजारी घुटमळत सोडेल
ती हिवाळी बात
परत अनुभवनयाची संधी हवीये।
Friday, December 18, 2009
सिलसिले
बरबाद मंजरों में
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली न करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं।
बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं।
और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा।
फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम।
शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं।
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली न करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं।
बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं।
और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा।
फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम।
शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं।
Thursday, December 17, 2009
रांगोळया
आठवणींच्या रांगोळया
काढत बसलोये
प्रभात नाही
मध्यरात्रच आहे
चंद्राला रंग सापडलेयेत
मी चांदणीशी खेळत बसलोये.
कधी फुल
तर कधी षटकोण
कधी आखीव
नाहीतर कधी रुपबद्ध
ठिंबांनीं साचेबध्द
तर कधी मुक्त हस्त.
एक दीप मध्यभागी
कधी पायाशी स्वस्तींक
आमंत्रणच जणू
इवल्याश्या वस्तीत
जेथे नांदतात
कुणी परीमळ.
त्या घरात
नि गोठ्यात
किती हबंरणे ऐकीले
चंद्रा शोध रे जरा
आज दुधावीणा
वासरू कुठे भटकले.
काढत बसलोये
प्रभात नाही
मध्यरात्रच आहे
चंद्राला रंग सापडलेयेत
मी चांदणीशी खेळत बसलोये.
कधी फुल
तर कधी षटकोण
कधी आखीव
नाहीतर कधी रुपबद्ध
ठिंबांनीं साचेबध्द
तर कधी मुक्त हस्त.
एक दीप मध्यभागी
कधी पायाशी स्वस्तींक
आमंत्रणच जणू
इवल्याश्या वस्तीत
जेथे नांदतात
कुणी परीमळ.
त्या घरात
नि गोठ्यात
किती हबंरणे ऐकीले
चंद्रा शोध रे जरा
आज दुधावीणा
वासरू कुठे भटकले.
Saturday, December 12, 2009
दामन
मेरे गम पर हस रहे हो
पर ये दुवा ले लो मुझसे
की तुम खुदको
कभी न पाओ यहाँ
ज़िन्दगी के बहोतसे मायने हैं
उन सबको छोड़
कभी न आओ यहाँ।
कोई बात नहीं के
तुम्हें ये महसूस न हो
के जलती हैं रोशनी कैसे
बस दिया होता हैं कोई
जो अंधियारे को मिटा दे
इतनी ही तुम
गुफ्तगू करो।
मौसम खड़ा अपने आप को
कितना बदल लेता हैं
कोई पत्थर हैं
जिस पर नया रंग पोत दो
खुशहाल होगा सब कुछ
आती जाती हवां से
कुछ पुछने की परवाह न करो।
राह भुल तुमने
जो आज कुछ देख लिया हैं
सुबह उठते सब भुल जाओ
हर दामन यूँ ही
हाथ नहीं आता
बस इतना जान लो
और कुछ जानने की
फिक्र न करो।
पर ये दुवा ले लो मुझसे
की तुम खुदको
कभी न पाओ यहाँ
ज़िन्दगी के बहोतसे मायने हैं
उन सबको छोड़
कभी न आओ यहाँ।
कोई बात नहीं के
तुम्हें ये महसूस न हो
के जलती हैं रोशनी कैसे
बस दिया होता हैं कोई
जो अंधियारे को मिटा दे
इतनी ही तुम
गुफ्तगू करो।
मौसम खड़ा अपने आप को
कितना बदल लेता हैं
कोई पत्थर हैं
जिस पर नया रंग पोत दो
खुशहाल होगा सब कुछ
आती जाती हवां से
कुछ पुछने की परवाह न करो।
राह भुल तुमने
जो आज कुछ देख लिया हैं
सुबह उठते सब भुल जाओ
हर दामन यूँ ही
हाथ नहीं आता
बस इतना जान लो
और कुछ जानने की
फिक्र न करो।