बारीश के संग कुछ भीग रहा हैं
कुछ था साथ जो छुट रहा हैं,
बह रहा हैं मिटटी पर वो कतरा
जाने कौनसा रंग उतर रहा हैं।
यूँ तो बादलो की छांव माझी रही हैं
पर कश्ती डूबने का आसार हो रहा हैं,
किनारा तो नहीं माँगा
फिर किस धरती का अहसास हो रहा हैं।
जो कुछ था वो ढ़ह रहा हैं
बिना आवाज किए सरक रहा हैं,
फिर ये खामोशी क्यों बोल उठती हैं
बिजली के संग क्या कोई कुछ कह रहा हैं।
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