Thursday, June 25, 2009

रहां हूँ

तेरे दर्द को निहारता हुआ
मैं मीलो दूर चल रहां हूँ,
पर ये फासला कम नहीं होता
ना मुझे पता हैं मैं कहाँ हूँ।

यूं तो ये उलझन यूँ मिट जाए
पर किसी सुलझन के लिए ठहर गया हूँ,
खुली आंखों में सपने नहीं होते
पर पलके बंद हो जाए यहीं तो मैं कह रहां हूँ।

काश चलने का कोई जरीया होता
मैं लकड़ी के सहारे जी रहां हूँ,
कंधों के बल उठा ले कोई
लकड़ी जलने की तो रहां मैं तक रहां हूँ।

Wednesday, June 24, 2009

क्या होगा?

कह भी दूँ तुम्हे
पर मतलब क्या होगा?
वही पुराना दौर
और क्या होगा?

रोक रखा हैं मैंने
इस दिल को,
नासमझ यूं
धड़कने से क्या होगा?
गलियां नई होती हैं
पर शीशा तो वही,
यूं बेकारा
दीवानगी से क्या होगा?

आरजू कोई ये
आज की नहीं,
फिर दोहराने से
नया क्या होगा?
हर दिन तो
सूरज अलग हैं,
पर शाम से हैं जो वास्ता,
उसका क्या होगा?

Sunday, June 21, 2009

होश

जल तो गया
पर ये धुँवा
हवा के पर ले
उड़ चला हैं,
तुमने जो मिटाया हैं
वो राख़ का ढेर,
बस तो एक
काला साया हैं

आज तुम रोते हो
संग काजल भी
बह चला,
क्या कोई ठीकाना हैं?
मौजूदगी किसकी
सही हैं तुमने,
परेशां फिर क्यों
ये जमाना हैं

बर्फ भी पिघलती
सागर को ढूंढे हैं,
फिर ये ऊंचाई
किसका बहाना हैं?
जव्लामुखी गर फटे
तो बस यहीं धुँवा
हर तरफ़,
क्या जरा होश भी हैं?





Tuesday, June 16, 2009

मोहब्बत

इन गलियों में
कूंचों में
आवाजे लगाता हूँ मैं,
शोर में मशगुल
यें दीवारे
मुझ पर हँसते हुए
पाता हूँ मैं,
तेरी दीद से
इनकार नहीं मुझे खुदा,
फ़िर क्यों ख़ुद को अकेला
पाता हूँ मैं

हर झरना और बूँद
बस तेरी,
पर बूंदाबांदी पर
उतर आता हूँ मैं,
क्यों इस बारिश में
मेरे मौला,
ख़ुद को रोता
पाता हूँ मैं

मेरी रूह में तू
बसता हैं,
फिर भी फासला
यूँ गाता हूँ मैं,
मुझे इतनी मोहब्बत
दे अल्लाह,
के आहट तेरी जुदाई की
पाता हूँ मैं

Friday, June 12, 2009

क्या बाकि


दिल बहलाने को

ख़याल तो बहोत हैं

मगर बहलाने का ख़याल

छोड़ दो - तो क्या बाकि।

गुजरते हुए इस वक्त के

मकाम तो बहोत हैं

मगर चंद लम्हों की

इस जिंदगी मैं क्या बाकि ।

कोई हमदर्द मील भी जाए

चलने को ये रास्ता

मगर मंजिल ही न हो

तो दर्द क्या बाकि ।