स्थित्यंतरे किती पाहिलीत
या इथे स्थिरावर होवूनी
क्रमशः जोपासलेले
काही गीते काही आठवणी।
प्रवासी क्षणभराचे
घटकेला विसावलेले
धाव कुठलीतरी
तरीही थोडेसे जकडलेले।
अस्तित्व माझे
दुर्लक्षित कधी - कधी आपुलेसे
जाणीव पुर्वक कधी कोण
मजसी बोलले।
ऋतुं सारखेच
येणे जाणे लागलेले
वाट कुणाला कुणाची
मी इथेच - कुणासाठी।
माझ्या भाग्यी
चलचित्राचे जीणे
या बाकावर रोजच
कुणी पाहुणे - कुणी मज बिलगलेले।
Thursday, December 24, 2009
Wednesday, December 23, 2009
काय हरविले
शोधसी कुणास
या धुक्यात सवालीचाही
नसे आभास
हवेत चाचपड्ती हे हात
कुठल्या वादळाला।
शमेल ते तूफ़ान
असे वाटे जरी आज
ज्याचा आरभंही न पाहिला
त्या दिव्याचा
प्रकाश खुंटेल का।
विझतात वाती सा-या
नी तेलही सरे
विस्तारणा-या आगीत
कुठली राख जळे।
भस्म माथ्यावरचे
पिढ्यान पिढ्या वारसा हाताळे
हस्तक कोण
कुणी सांगावे।
सांगाव्यास कुणी
विसरुनी गेले
शोधा - शोधा अरे
काय हरविले।
या धुक्यात सवालीचाही
नसे आभास
हवेत चाचपड्ती हे हात
कुठल्या वादळाला।
शमेल ते तूफ़ान
असे वाटे जरी आज
ज्याचा आरभंही न पाहिला
त्या दिव्याचा
प्रकाश खुंटेल का।
विझतात वाती सा-या
नी तेलही सरे
विस्तारणा-या आगीत
कुठली राख जळे।
भस्म माथ्यावरचे
पिढ्यान पिढ्या वारसा हाताळे
हस्तक कोण
कुणी सांगावे।
सांगाव्यास कुणी
विसरुनी गेले
शोधा - शोधा अरे
काय हरविले।
Tuesday, December 22, 2009
हवीये
माझ्या गारठलेल्या हातांना
शेकोटीची उब हवीये
मफलर आणि माकड टोपीत
गल्लीच्या टोकाला गंमत हवीये।
पहाटे उठून चोरीच्या लाकडांना
जाळण्याचे सुख हवय
कुत्रे भुंकत असताना
त्यांना धमकवण्याची उसनी हिम्मत हवीये।
धुक्यातून सूर्य किरण टिपतांना
क्षितिज सामावल्याचा भास हवाये
काचेवर दवात नाव कोरतांना
सोन्याची किनार हवीये।
सकाळ जी जीवलगांना
दाटीवाटीच्या शेजारी घुटमळत सोडेल
ती हिवाळी बात
परत अनुभवनयाची संधी हवीये।
शेकोटीची उब हवीये
मफलर आणि माकड टोपीत
गल्लीच्या टोकाला गंमत हवीये।
पहाटे उठून चोरीच्या लाकडांना
जाळण्याचे सुख हवय
कुत्रे भुंकत असताना
त्यांना धमकवण्याची उसनी हिम्मत हवीये।
धुक्यातून सूर्य किरण टिपतांना
क्षितिज सामावल्याचा भास हवाये
काचेवर दवात नाव कोरतांना
सोन्याची किनार हवीये।
सकाळ जी जीवलगांना
दाटीवाटीच्या शेजारी घुटमळत सोडेल
ती हिवाळी बात
परत अनुभवनयाची संधी हवीये।
Friday, December 18, 2009
सिलसिले
बरबाद मंजरों में
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली न करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं।
बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं।
और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा।
फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम।
शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं।
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली न करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं।
बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं।
और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा।
फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम।
शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं।
Thursday, December 17, 2009
रांगोळया
आठवणींच्या रांगोळया
काढत बसलोये
प्रभात नाही
मध्यरात्रच आहे
चंद्राला रंग सापडलेयेत
मी चांदणीशी खेळत बसलोये.
कधी फुल
तर कधी षटकोण
कधी आखीव
नाहीतर कधी रुपबद्ध
ठिंबांनीं साचेबध्द
तर कधी मुक्त हस्त.
एक दीप मध्यभागी
कधी पायाशी स्वस्तींक
आमंत्रणच जणू
इवल्याश्या वस्तीत
जेथे नांदतात
कुणी परीमळ.
त्या घरात
नि गोठ्यात
किती हबंरणे ऐकीले
चंद्रा शोध रे जरा
आज दुधावीणा
वासरू कुठे भटकले.
काढत बसलोये
प्रभात नाही
मध्यरात्रच आहे
चंद्राला रंग सापडलेयेत
मी चांदणीशी खेळत बसलोये.
कधी फुल
तर कधी षटकोण
कधी आखीव
नाहीतर कधी रुपबद्ध
ठिंबांनीं साचेबध्द
तर कधी मुक्त हस्त.
एक दीप मध्यभागी
कधी पायाशी स्वस्तींक
आमंत्रणच जणू
इवल्याश्या वस्तीत
जेथे नांदतात
कुणी परीमळ.
त्या घरात
नि गोठ्यात
किती हबंरणे ऐकीले
चंद्रा शोध रे जरा
आज दुधावीणा
वासरू कुठे भटकले.
Saturday, December 12, 2009
दामन
मेरे गम पर हस रहे हो
पर ये दुवा ले लो मुझसे
की तुम खुदको
कभी न पाओ यहाँ
ज़िन्दगी के बहोतसे मायने हैं
उन सबको छोड़
कभी न आओ यहाँ।
कोई बात नहीं के
तुम्हें ये महसूस न हो
के जलती हैं रोशनी कैसे
बस दिया होता हैं कोई
जो अंधियारे को मिटा दे
इतनी ही तुम
गुफ्तगू करो।
मौसम खड़ा अपने आप को
कितना बदल लेता हैं
कोई पत्थर हैं
जिस पर नया रंग पोत दो
खुशहाल होगा सब कुछ
आती जाती हवां से
कुछ पुछने की परवाह न करो।
राह भुल तुमने
जो आज कुछ देख लिया हैं
सुबह उठते सब भुल जाओ
हर दामन यूँ ही
हाथ नहीं आता
बस इतना जान लो
और कुछ जानने की
फिक्र न करो।
पर ये दुवा ले लो मुझसे
की तुम खुदको
कभी न पाओ यहाँ
ज़िन्दगी के बहोतसे मायने हैं
उन सबको छोड़
कभी न आओ यहाँ।
कोई बात नहीं के
तुम्हें ये महसूस न हो
के जलती हैं रोशनी कैसे
बस दिया होता हैं कोई
जो अंधियारे को मिटा दे
इतनी ही तुम
गुफ्तगू करो।
मौसम खड़ा अपने आप को
कितना बदल लेता हैं
कोई पत्थर हैं
जिस पर नया रंग पोत दो
खुशहाल होगा सब कुछ
आती जाती हवां से
कुछ पुछने की परवाह न करो।
राह भुल तुमने
जो आज कुछ देख लिया हैं
सुबह उठते सब भुल जाओ
हर दामन यूँ ही
हाथ नहीं आता
बस इतना जान लो
और कुछ जानने की
फिक्र न करो।
Friday, December 11, 2009
ले जां
उन हातों को सिरहाने रख
आँखें मूँद
बस कुछ न बोल
जिस घड़ी में
मर के जिया जाता हैं
वहां ले जां
मुझे छोड़।
साँस आके चल दी
जरासा शोर भी न हो
यहाँ तक की
अगली गर्माहट आए न आए
इसका जज्ब ही न हो
बिना छुये ही
ऐसी हवां की परत पर ले जा
पत्ता गिर पड़े
और दरख़्त को इल्म ही न हो।
उस बूँद को
जो कोई उड़ेल गया
कमल की पंखुड़ियों से सरककर
फिर से पानी में जो
डूबने वाली ही हो
उसी क्षण तक मुझे ले जा
उसी कगार पर छोड़ जा।
जो था वो नहीं
जो आनेवाला हैं
वो भी नहीं
अब - यहीं - जहाँ
मैं - मैं हूँ
उसको सामने रख -
खुदको अगर मैंने
वहां ढूँढ लिया
तो बेशक जां निकल
मैं - मैं वहाँ नहीं हूँ।
आँखें मूँद
बस कुछ न बोल
जिस घड़ी में
मर के जिया जाता हैं
वहां ले जां
मुझे छोड़।
साँस आके चल दी
जरासा शोर भी न हो
यहाँ तक की
अगली गर्माहट आए न आए
इसका जज्ब ही न हो
बिना छुये ही
ऐसी हवां की परत पर ले जा
पत्ता गिर पड़े
और दरख़्त को इल्म ही न हो।
उस बूँद को
जो कोई उड़ेल गया
कमल की पंखुड़ियों से सरककर
फिर से पानी में जो
डूबने वाली ही हो
उसी क्षण तक मुझे ले जा
उसी कगार पर छोड़ जा।
जो था वो नहीं
जो आनेवाला हैं
वो भी नहीं
अब - यहीं - जहाँ
मैं - मैं हूँ
उसको सामने रख -
खुदको अगर मैंने
वहां ढूँढ लिया
तो बेशक जां निकल
मैं - मैं वहाँ नहीं हूँ।
Thursday, December 10, 2009
चक्रव्युह
चक्रव्युह से एक बार फिर
काल जो तु मुझे आज
ले जा रहाँ हैं
जरा कुछ पूंछ ही लुँ
जो हमेशा से पूंछा जा रहाँ हैं।
आज जिस निर्णय की
रोशनी परे मुझे
फिर से खड़ा किया जाएगा
क्या कभी तुम्हे भी वहां
सर झुकाना पड़ता हैं?
या तुम शर्मिंदा नहीं होते
की मुझे यहाँ बार बार लाया जाता हैं।
समय का चक्र
तो कालबाधित ही हैं
जिसका का नाश
मेरे वश में नहीं
में बाहर - फिर चक्रव्युह की रचना में -
फिरसे बाहर
इस प्रतारणा की घड़ी में
क्या तुम शामिल नहीं?
आमुख खड़े तुम बस चल रहे हो
क्या तुम्हे इस बात का अहसास नहीं
मुझमें तो जान हर बार फूंकी जाती हैं
पर तुम तो मर चुके हो
क्या इसका तुम्हे इल्म नहीं?
दुष्ट हैं वो अर्ध्य सत्य
जो मेरी तरह तुम्हे भी
दोलायमान रखता हैं
मैंने कितनी बार यहाँ लिखा हैं
की चक्रव्युह नहीं बदलता हैं।
------------------------------------------------------------
टिपण्णी: दिलीप चित्रे (१९३८ - २००९ ) की रचना से प्रेरित। उन्हें हार्दिक श्रध्दांजली।
काल जो तु मुझे आज
ले जा रहाँ हैं
जरा कुछ पूंछ ही लुँ
जो हमेशा से पूंछा जा रहाँ हैं।
आज जिस निर्णय की
रोशनी परे मुझे
फिर से खड़ा किया जाएगा
क्या कभी तुम्हे भी वहां
सर झुकाना पड़ता हैं?
या तुम शर्मिंदा नहीं होते
की मुझे यहाँ बार बार लाया जाता हैं।
समय का चक्र
तो कालबाधित ही हैं
जिसका का नाश
मेरे वश में नहीं
में बाहर - फिर चक्रव्युह की रचना में -
फिरसे बाहर
इस प्रतारणा की घड़ी में
क्या तुम शामिल नहीं?
आमुख खड़े तुम बस चल रहे हो
क्या तुम्हे इस बात का अहसास नहीं
मुझमें तो जान हर बार फूंकी जाती हैं
पर तुम तो मर चुके हो
क्या इसका तुम्हे इल्म नहीं?
दुष्ट हैं वो अर्ध्य सत्य
जो मेरी तरह तुम्हे भी
दोलायमान रखता हैं
मैंने कितनी बार यहाँ लिखा हैं
की चक्रव्युह नहीं बदलता हैं।
------------------------------------------------------------
टिपण्णी: दिलीप चित्रे (१९३८ - २००९ ) की रचना से प्रेरित। उन्हें हार्दिक श्रध्दांजली।
Monday, November 23, 2009
फर्शी
उशीखालच्या ह्या रुमालात
कुठला स्पर्श शोधु
घड़ी घातलेले अंथरुण
अजुन लोळत पडले आहे
कुणाच्या डोळ्यावर
दोन थेंब पाणी शिपंडू?
तो कंगवा मख्ख
त्या आरश्याकडे पाहत बसलाये
जणु अजुन सकाळ व्हायचीये
कुठल्या गप्पांमधे
कपाट गुतंलाये
किती आवरावर अजुन व्हायचीये।
पंखा हा जुनाट
नेहमीसारखं गरगरत थकलाये
तरी घामाचा एकही बिंदु
अंगावर नाही
विजेचं बटन घालवायला
कुणी साफ़ विसरलय।
दार अस उघडं
मोकळं आकाश घेवुन
भिंतीच्या पाटीला टेकलय
नशीब या फर्शीने
आतावर तरी
माझं वजन पेलवलय।
कुठला स्पर्श शोधु
घड़ी घातलेले अंथरुण
अजुन लोळत पडले आहे
कुणाच्या डोळ्यावर
दोन थेंब पाणी शिपंडू?
तो कंगवा मख्ख
त्या आरश्याकडे पाहत बसलाये
जणु अजुन सकाळ व्हायचीये
कुठल्या गप्पांमधे
कपाट गुतंलाये
किती आवरावर अजुन व्हायचीये।
पंखा हा जुनाट
नेहमीसारखं गरगरत थकलाये
तरी घामाचा एकही बिंदु
अंगावर नाही
विजेचं बटन घालवायला
कुणी साफ़ विसरलय।
दार अस उघडं
मोकळं आकाश घेवुन
भिंतीच्या पाटीला टेकलय
नशीब या फर्शीने
आतावर तरी
माझं वजन पेलवलय।
Thursday, November 19, 2009
कृपार्थीक
आज रात्र किती प्रकाशमय
सोबत रातराणीची
सुवास या पहाटेचा
दरवळतोये ह्या गगनी।
सुर्याची कोमल किरणे
डोकावतायेत त्या टेकडीमागुनी
पक्षी सोडतायेत घरटी
भरारी एकच नवी।
गजबजले हे सारे रस्ते
सडे नी रांगोळ्यांनी
प्रभातिक हे दृश्य
मनोहर ह्या भुवनी।
कांतीला स्नान
स्मरण माझ्या प्रभुचे
सुरेख असा मी ओसंडून वाहतोये
कृपार्थीक या जगती।
सोबत रातराणीची
सुवास या पहाटेचा
दरवळतोये ह्या गगनी।
सुर्याची कोमल किरणे
डोकावतायेत त्या टेकडीमागुनी
पक्षी सोडतायेत घरटी
भरारी एकच नवी।
गजबजले हे सारे रस्ते
सडे नी रांगोळ्यांनी
प्रभातिक हे दृश्य
मनोहर ह्या भुवनी।
कांतीला स्नान
स्मरण माझ्या प्रभुचे
सुरेख असा मी ओसंडून वाहतोये
कृपार्थीक या जगती।
Monday, November 16, 2009
दिवस
मी मृत आहे
नी निजलेला
जाणीव नसे ज्याला
आज दिवस कुठला।
रवी आहे उभा
काळ सरकत ठाई
काटे गोल का फिरतात
मज उमजत नाही।
किती समज कुणी
जरी पुढ्यात मांडिली
संवेदनेचा संवाद आता
पडद्यावर उमटत नाही।
पाउलांच्या आठवणी
ठश्यात विरुनी गेल्या
समुद्राच्या घडित
आता आवेग नाही।
अंतर किती आज
मी गाठीले आहे
मी आहे तोच जुना
हा प्रश्नच उरत नाही।
बाकी आहे काही
या भागाकारात सख्या
तुझ्या या शब्दानां मात्र
अर्थाची सावली नाही।
या अंधारात सारे
हरवून बसलो
आता चांदणीचा उजेड
मला भावत नाही।
ज्या नक्षत्रात
आपण कधी रमलो - हरपलो
आता तो मौसम परतणे
शक्य नाही।
जे होते भाग्यी
ते सारे जीवन जगलो
आता या रात्रीत नवीन
दिवस नाहीत।
नी निजलेला
जाणीव नसे ज्याला
आज दिवस कुठला।
रवी आहे उभा
काळ सरकत ठाई
काटे गोल का फिरतात
मज उमजत नाही।
किती समज कुणी
जरी पुढ्यात मांडिली
संवेदनेचा संवाद आता
पडद्यावर उमटत नाही।
पाउलांच्या आठवणी
ठश्यात विरुनी गेल्या
समुद्राच्या घडित
आता आवेग नाही।
अंतर किती आज
मी गाठीले आहे
मी आहे तोच जुना
हा प्रश्नच उरत नाही।
बाकी आहे काही
या भागाकारात सख्या
तुझ्या या शब्दानां मात्र
अर्थाची सावली नाही।
या अंधारात सारे
हरवून बसलो
आता चांदणीचा उजेड
मला भावत नाही।
ज्या नक्षत्रात
आपण कधी रमलो - हरपलो
आता तो मौसम परतणे
शक्य नाही।
जे होते भाग्यी
ते सारे जीवन जगलो
आता या रात्रीत नवीन
दिवस नाहीत।
Saturday, October 31, 2009
रात्र
ये रात्र तू ये
तुझी गरज तशी फार नाहीये
पण अंधारात अंधार विस्तारला
तर फार हरकत नाहीये।
हो तू म्हणशीलच
की रोजचा हा तुझा दिनक्रम
पण दिवस हिरावून तू येतेस
म्हणून तुला ही आठवण।
नाही तुझ्याशी वैर नाही
सुखद निद्रा नी स्वप्न देण तुझी
पण जेव्हा दिवास्वप्न बघत निद्रानाश होतो
रवीची आहुतीही मग तुझ्याच कुशी।
राग किंवा तुझा क्षोभही नाही
अस्तित्वाशी कशाला करायची लढाई
साम्राज्य तुझे हरवते पृथ्वीलाही
चंद्राची कोरही विस्फारून अमाव्यस्या पाही।
तूच आता खर तर झालीस आई
तुझ्यातच विलीन होईल ही माझी शाई
ये रात्र तू ये
जगणे आणि मरणे यात आता कुठला फरक नाही।
तुझी गरज तशी फार नाहीये
पण अंधारात अंधार विस्तारला
तर फार हरकत नाहीये।
हो तू म्हणशीलच
की रोजचा हा तुझा दिनक्रम
पण दिवस हिरावून तू येतेस
म्हणून तुला ही आठवण।
नाही तुझ्याशी वैर नाही
सुखद निद्रा नी स्वप्न देण तुझी
पण जेव्हा दिवास्वप्न बघत निद्रानाश होतो
रवीची आहुतीही मग तुझ्याच कुशी।
राग किंवा तुझा क्षोभही नाही
अस्तित्वाशी कशाला करायची लढाई
साम्राज्य तुझे हरवते पृथ्वीलाही
चंद्राची कोरही विस्फारून अमाव्यस्या पाही।
तूच आता खर तर झालीस आई
तुझ्यातच विलीन होईल ही माझी शाई
ये रात्र तू ये
जगणे आणि मरणे यात आता कुठला फरक नाही।