Tuesday, September 29, 2009

अमावस

सबेर दर सबेर
शाम हुए जा रही हैं,
ये धुंवा गर्दिश का
पहलु मैं छुपा रही हैं

अभी रोशन किरने
दरवाजों को रोंध रहीं हैं,
गुजारा करने की गुजारिश
अन्दर छा रहीं हैं

बारिश ने भी पनाह
किसी सन्नाटे की ली हैं,
की चिडियां सो जाए
इतनी तक्कलुफ़ की हैं

सब कुछ तो हैं अभी यहाँ
शायद किसीने गुस्ताखी की हैं,
आज अमावस हैं काली
लाल रंगोली बेकरार हो चली हैं

Friday, September 25, 2009

गुनाह

साँझ ढल चुकी हैं
और आगोश में तुम मेरे
हर साँस का एहसास मेरे सीने मैं
की भुला कुछ भी तो नहीं

अभी वो आहट हुई
और तुम मुस्कुरा दिए यूँ
हर अदा तेरी मुझ संग
की कुछ संवारा भी तो नहीं

एक सरसराहट हुई
जो तुमने हलके से छुआ
वो जलवे की रात आवारा
की सूरज उगा भी तो नहीं

नक्श कोई छुटा
और तुमने की शरारत
तुम छुप गए थे कहीं
की हमने ढूँढा भी तो नहीं

मदहोश वो आलम
तुम्हारी पेशानी को जो चूमा
हाय वक्त तो वहीँ थम गया
की कोई गुनाह भी तो नहीं

Sunday, September 13, 2009

वक्त

जहाँ बैठे थे हम
उस चट्टान से पूछा
क्या मकाम ऊंचाई का यहीं हैं,
तो उसने कहा वक्त बताएगा

जिन गलियों को पीछे छोड़ आए
वो अब राह नहीं तकती
की कोई नामों निशाँ भी रहां,
और हम पाते हैं ख़ुद को अकेले
वक्त का हमे ख़याल ही रहां

बड़ा सुहाना मंजर हैं
की सारी धरती सजी हुई लगती हैं,
किसीको हम बताना चाहे भी
तो कोई गवाह अब इस किनारे रहां
ना गुजरे हुए वक्त का दामन हैं रवां

अब अरमां भी नहीं मचलते जी मैं
अरमानो का अब दौर कहाँ रहां,
कभी सुना था कोई किस्सा
की वक्त वक्त की बात हैं
अब तो हमे किसी पत्थर पर भरोसा रहां

Wednesday, September 02, 2009

करो

वादों के आगे कभी
कुछ और भी तो जुल्म ढाया करो
सब टूंट जाता हैं पल मे
इससे बढ़कर भी तो सिखाया करो

नहीं अब रहते हम परेशान
के अब ये तो आदत सी हो गई हैं
कभी आदतों को भी तो तुम
अपने सितम से सजाया करो

हाँ सब कुछ शामिल हैं
इस टूटती ज़िन्दगी में तुम्हारे सिवा
साँस ही रुक जाए हमारी
कभी तो ये करम -
हम पर किया करो