इन गलियों में
कूंचों में
आवाजे लगाता हूँ मैं,
शोर में मशगुल
यें दीवारे
मुझ पर हँसते हुए
पाता हूँ मैं,
तेरी दीद से
इनकार नहीं मुझे खुदा,
फ़िर क्यों ख़ुद को अकेला
पाता हूँ मैं।
हर झरना और बूँद
बस तेरी,
पर बूंदाबांदी पर
उतर आता हूँ मैं,
क्यों इस बारिश में
मेरे मौला,
ख़ुद को रोता
पाता हूँ मैं।
मेरी रूह में तू
बसता हैं,
फिर भी फासला
यूँ गाता हूँ मैं,
न मुझे इतनी मोहब्बत
दे अल्लाह,
के आहट तेरी जुदाई की
पाता हूँ मैं।
No comments:
Post a Comment