जल तो गया
पर ये धुँवा
हवा के पर ले
उड़ चला हैं,
तुमने जो मिटाया हैं
वो राख़ का ढेर,
बस तो एक
काला साया हैं।
आज तुम रोते हो
संग काजल भी
बह चला,
क्या कोई ठीकाना हैं?
मौजूदगी किसकी
सही हैं तुमने,
परेशां फिर क्यों
ये जमाना हैं।
बर्फ भी पिघलती
सागर को ढूंढे हैं,
फिर ये ऊंचाई
किसका बहाना हैं?
जव्लामुखी गर फटे
तो बस यहीं धुँवा
हर तरफ़,
क्या जरा होश भी हैं?
No comments:
Post a Comment