जहाँ बैठे थे हम
उस चट्टान से पूछा
क्या मकाम ऊंचाई का यहीं हैं,
तो उसने कहा वक्त बताएगा।
जिन गलियों को पीछे छोड़ आए
वो अब राह नहीं तकती
की कोई नामों निशाँ भी न रहां,
और हम पाते हैं ख़ुद को अकेले
वक्त का हमे ख़याल ही न रहां।
बड़ा सुहाना मंजर हैं
की सारी धरती सजी हुई लगती हैं,
किसीको हम बताना चाहे भी
तो कोई गवाह अब इस किनारे न रहां
ना गुजरे हुए वक्त का दामन हैं रवां।
अब अरमां भी नहीं मचलते जी मैं
अरमानो का अब दौर कहाँ रहां,
कभी सुना था कोई किस्सा
की वक्त वक्त की बात हैं
अब तो हमे किसी पत्थर पर भरोसा न रहां।
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