वादों के आगे कभी
कुछ और भी तो जुल्म ढाया करो
सब टूंट जाता हैं पल मे
इससे बढ़कर भी तो सिखाया करो।
नहीं अब रहते हम परेशान
के अब ये तो आदत सी हो गई हैं
कभी आदतों को भी तो तुम
अपने सितम से सजाया करो।
हाँ सब कुछ शामिल हैं
इस टूटती ज़िन्दगी में तुम्हारे सिवा
साँस ही रुक जाए हमारी
कभी तो ये करम -
हम पर किया करो।
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