Tuesday, September 29, 2009

अमावस

सबेर दर सबेर
शाम हुए जा रही हैं,
ये धुंवा गर्दिश का
पहलु मैं छुपा रही हैं

अभी रोशन किरने
दरवाजों को रोंध रहीं हैं,
गुजारा करने की गुजारिश
अन्दर छा रहीं हैं

बारिश ने भी पनाह
किसी सन्नाटे की ली हैं,
की चिडियां सो जाए
इतनी तक्कलुफ़ की हैं

सब कुछ तो हैं अभी यहाँ
शायद किसीने गुस्ताखी की हैं,
आज अमावस हैं काली
लाल रंगोली बेकरार हो चली हैं

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