साँझ ढल चुकी हैं
और आगोश में तुम मेरे
हर साँस का एहसास मेरे सीने मैं
की भुला कुछ भी तो नहीं।
अभी वो आहट हुई
और तुम मुस्कुरा दिए यूँ
हर अदा तेरी मुझ संग
की कुछ संवारा भी तो नहीं।
एक सरसराहट हुई
जो तुमने हलके से छुआ
वो जलवे की रात आवारा
की सूरज उगा भी तो नहीं।
नक्श कोई छुटा
और तुमने की शरारत
तुम छुप गए थे कहीं
की हमने ढूँढा भी तो नहीं।
मदहोश वो आलम
तुम्हारी पेशानी को जो चूमा
हाय वक्त तो वहीँ थम गया
की कोई गुनाह भी तो नहीं।
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