Friday, September 25, 2009

गुनाह

साँझ ढल चुकी हैं
और आगोश में तुम मेरे
हर साँस का एहसास मेरे सीने मैं
की भुला कुछ भी तो नहीं

अभी वो आहट हुई
और तुम मुस्कुरा दिए यूँ
हर अदा तेरी मुझ संग
की कुछ संवारा भी तो नहीं

एक सरसराहट हुई
जो तुमने हलके से छुआ
वो जलवे की रात आवारा
की सूरज उगा भी तो नहीं

नक्श कोई छुटा
और तुमने की शरारत
तुम छुप गए थे कहीं
की हमने ढूँढा भी तो नहीं

मदहोश वो आलम
तुम्हारी पेशानी को जो चूमा
हाय वक्त तो वहीँ थम गया
की कोई गुनाह भी तो नहीं

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