Saturday, October 03, 2009

कसम

आज रुसवे की रात ही सहीं
पर जवाब तो जरूर लेंगे
अब मिटना और क्या बाकि रहां
पर बुझते हुए थोडी आग और देंगे
खामोशी को तो हमने हमेशा हैं समझा
थोड़े जजबाती आज बेशक होंगे

लम्हे हमने नहीं गिने कभी
की जिंदगी तो उनमे ही जी हैं
तेरा जिक्र था जहाँ भी
बस वहीँ बसने की फिक्र की हैं
जब तुम अब फेर रहें हो नजर को
भूल जाते हो हमने तेरे इश्क मैं कितनी जदेद्जोहत की हैं

किसी पे अहसान तो नहीं इश्क करना
की चुकता करने की कीमत नहीं हैं
बस दिल का मामला हैं चाहत
जो जुड़ गए तो मौत ही पी हैं
अगर हम प्यासे रहें तो सवाल था
पर तुम्हे हमारी वफाओं पे क्या कोई शिकायत हुई हैं

पर ये जो परदा सर पे लिए घूमते हो अब
किस जानशीन से तुमने रुखसत ली हैं
अगर दीवानगी पे हमारी भरोसा रहां
तो किस मयखाने मैं तुमने शिरकत की हैं
साकी ये तो बताते जा
क्या तुमने कभी मोह्हबत की हैं -
यूँ तो जमाना दीवाना हैं तेरा
पर मेरे बाद किसको सताने की
तुमने आज कसम ली हैं

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