Friday, December 18, 2009

सिलसिले

बरबाद मंजरों में
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं

बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं

और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा

फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम

शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं



No comments: