बरबाद मंजरों में
बिखरे पड़े फासले
समेटने की कोशिश
कोई वाली न करेगा
जो बच गया हैं
उसे क्या पता
कितनी बार यहाँ बीजों ने
उपजने की हिकमत की हैं।
बार बार लौटकर
कदम लड़खड़ाते हुए भी
पानी की तरह
उसी जगह को ढुंढ लेते हैं
अपनी मिटटी कौनसी
क्या रंग हैं उसका
ये तो सब जानते हैं।
और जान भी क्या सकते हैं
सिवाय खुदके
नजदीकिया तो फिरभी
आप नहीं होती
ये खाली जो बंजारापन हैं
यूँही उमड़ पड़ेगा
चाह भी हो गर मंजर की
तो भी फैसला यही होगा।
फर्क हैं पर इस लिबास में
किसी और को ढूंढे
तो झट बरबाद आलम
जो छोड़ दे अपने आपको भी
फिर ढूंढेने को
कौन बचा हैं बालम।
शर्तों की होड़ में
फासलों और मंजिलोंके
मायने होते हैं
पेड़ से उपजा कोई
और फिर उसी जमीं तले दब गया
जरा कोई मुसाफिरही
उसे कह देता
की सिलसिले ये बड़े लंबे हैं।
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