चक्रव्युह से एक बार फिर
काल जो तु मुझे आज
ले जा रहाँ हैं
जरा कुछ पूंछ ही लुँ
जो हमेशा से पूंछा जा रहाँ हैं।
आज जिस निर्णय की
रोशनी परे मुझे
फिर से खड़ा किया जाएगा
क्या कभी तुम्हे भी वहां
सर झुकाना पड़ता हैं?
या तुम शर्मिंदा नहीं होते
की मुझे यहाँ बार बार लाया जाता हैं।
समय का चक्र
तो कालबाधित ही हैं
जिसका का नाश
मेरे वश में नहीं
में बाहर - फिर चक्रव्युह की रचना में -
फिरसे बाहर
इस प्रतारणा की घड़ी में
क्या तुम शामिल नहीं?
आमुख खड़े तुम बस चल रहे हो
क्या तुम्हे इस बात का अहसास नहीं
मुझमें तो जान हर बार फूंकी जाती हैं
पर तुम तो मर चुके हो
क्या इसका तुम्हे इल्म नहीं?
दुष्ट हैं वो अर्ध्य सत्य
जो मेरी तरह तुम्हे भी
दोलायमान रखता हैं
मैंने कितनी बार यहाँ लिखा हैं
की चक्रव्युह नहीं बदलता हैं।
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टिपण्णी: दिलीप चित्रे (१९३८ - २००९ ) की रचना से प्रेरित। उन्हें हार्दिक श्रध्दांजली।
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