Friday, December 11, 2009

ले जां

उन हातों को सिरहाने रख
आँखें मूँद
बस कुछ बोल
जिस घड़ी में
मर के जिया जाता हैं
वहां ले जां
मुझे छोड़

साँस आके चल दी
जरासा शोर भी हो
यहाँ तक की
अगली गर्माहट आए आए
इसका जज्ब ही हो
बिना छुये ही
ऐसी हवां की परत पर ले जा
पत्ता गिर पड़े
और दरख़्त को इल्म ही हो

उस बूँद को
जो कोई उड़ेल गया
कमल की पंखुड़ियों से सरककर
फिर से पानी में जो
डूबने वाली ही हो
उसी क्षण तक मुझे ले जा
उसी कगार पर छोड़ जा

जो था वो नहीं
जो आनेवाला हैं
वो भी नहीं
अब - यहीं - जहाँ
मैं - मैं हूँ
उसको सामने रख -
खुदको अगर मैंने
वहां ढूँढ लिया
तो बेशक जां निकल
मैं - मैं वहाँ नहीं हूँ

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