Wednesday, October 28, 2009

आवाजे

दिखाई पड़ती हैं सबको
वो बारीश जो भिगों रहीं हैं
खुशी का ही तो आलम हैं
आज कोई नई शुरुवात हो रही हैं
एक नमकीन सी बूँद भी
इस दौरान संग बह गई हैं
चुपचाप किसीको बिना बताये
रुखसत ले गई हैं

झुटलाने के लाख तरीके
हर कोई अपना चुका हैं
शिकन छुपाता हुआ हसता चेहरा
और मसरूफ जिंदगी के आईने
ढंके जा रहें उन परतो को
जो शायद कभी थी ही नहीं
मानो झुर्रिया कह रहीं हो
सच्चाई और कोई हैं ही नहीं

अभी किस बात का हिसाब करे
खाते और बहीं तो बह गए
वो गंगा भी जो कल थी
पापों का सारा भार ले गई
अब गठरी को कहाँ खोजे
जब गांठ ही छुट गई
कोई कहता हैं अब भी राख़ बची हैं
यहाँ तो बस माटी हैं बिखरी हुई

बड़ा दर्द उठता हैं कभी कभी
और रात गुजरती हैं तारों को देख
सब कुछ सुनासा
लेकिन फिर भी भर जाता हैं
कोई कहानी हैं
जो दोहराती हैं अपने आप को
कुछ अनसुनी आवाजे
हमेशा से जो कुछ कहे जा रही हैं

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