Tuesday, October 20, 2009

बुझासा

आज जरा दिल खामोश हैं
शीशे के बाहर पीले पत्तों को देखता
बस खड़ा हैं चुपचाप
क्या जेहन मैं कुछ छुपाये हैं
किस बात को अन्दर खाए हैं
चेहरे पे नहीं अंदाज जरासा
कुछ सर्द हवा के झोंके
घिरे हुए हैं अपनी मस्ती मैं
अहसास तो रह गया हैं धरासा
उडेला मैंने कुछ परत पे
सूरज तो अब सहमा हैं
किसकी राह तकता हैं जलासा
हांथो की गर्मी भी नहीं बहला रही
जैसे खंजर पकड़े हुए हो
कैसे कहूँ की सब कुछ तो हैं अपनासा
दीवारों मैं तो पत्थर होते हैं
पर अब ये महल
क्यों लगता हैं बुझा - बुझासा
एक कतरा ही छलका देता
की मैं जी जाता
ऐसे चुपचाप भी तो नहीं मरां जाता

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