बहोत दूर - बहोत दूर
जहाँ नहीं कोई झरोखा
की उजाले को छु सकूँ
या ना वो रोशन रात
की चाँद का कतरा पी सकूँ
ऐसे आलम में अब मैं जीता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शीशे और तस्वीर के माने
छलकने से इनकार करते हैं
ना निगाहे ना साया
अपने आप को छूंतें हैं
ऐसे बेकदर लम्हों में अब मैं रहता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
शिकवे और गिले
नीला आसमान नहीं पाते
ना बेरुख वो हवा छूती
की अहसास ही हो जाए होने का
ऐसे दरकिनार गोते मैं लेता हूँ।
बहोत दूर - बहोत दूर
सोच के परे
मीलों अब चल चुका
गुफ्तगू भी नहीं आशना
की सिल गया सब कुछ
ऐसे किसी रोशन कब्र में मैं बसता हूँ।
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